PODCAST-चूल्हे की रोटी 

. इस कहानी को मेरी आवाज मे सुनने के लिए आपलोग इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं।

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आधुनिकता का दम भरने वाले शहर

ज़रा सा गांव की तरफ तो झाँको…

जंक फूड और एल्कोहल के नशे मे
झूमती युवा पीढ़ी….

रोटी की मशक्कत मे जुटे बचपन की
सीढ़ियों की तरफ भी तो ताको….

समय से पहले बूढ़ा हो चला तन और
रोटियों की जद्दोजहद मे जुटे हुए मन
को ज़रा सा करीब तो लाओ….

छुपे होते हैं सभ्य समाज के चेहरों

के पीछे नरभक्षी भेड़िये भी

ज़रा सा उनके अंर्तमन को भी

तो झझकोरो….

जागता है शहर रात मे आधुनिकता के

अभिमान के तले…..

जागता है गरीबों का घर भी
बरसात के दिनो मे टपकते हुए
घरों मे सूखा कोना तलाशते हुए…

आज फिर से गांव मे पंचायत बैठी कई मसले सुलझाने जरूरी थे ,ग्राम सभा की जमीन के मुद्दे के साथ-साथ गांव मे भी बी पी एल कार्ड का दौर चल गया था । पंचो ने सारे पुरूषों और घूँघट के पीछे मुँह छिपा कर बैठी हुई औरतों की तरफ देखते हुए अपनी आवाज को जरा ऊँचा किया ।

अब हमारे गांव मे किसी घर मे लकड़ी, उपला से रोटी बनाने की कोई जरूरत नही ,सब अपना अपना बी पी ल कार्ड और जरूरी रुपया पैसा लेकर सेन्टर आ जाना सबको एल पी जी सिलेंडर और चूल्हा एकमुश्त पैसा देकर मिल जायेगा ।

गरीब औरतों के साथ साथ युवावस्था की दहलीज पर कदम रखती हुई लड़कियों के चेहरे खिल गये ,नही तो घर का चूल्हा चौका ,जानवर,छोटा मोटा खेती बाड़ी का काम समेटने के बाद दूर जंगल की तरफ लकड़ियाँ इकट्ठा करने जाने का काम भी तो इन्हीं औरतों और बच्चियों के जिम्मे रहता है।

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तेतरी और उसकी बहन अपनी माँ के गले मे झूल गई ,बदले मे दो चार थप्पड़ भी खा ली,यही तो आपस मे प्यार “मनुहार”करने का तरीका था । बड़ी बेटी खुश होकर अपनी छोटी बहन और माँ को बता रही थी, चम्मच जैसा बटन वाला एक समान होता है । बटन दबाकर स्टील के चूल्हे के पास ले जाते ही आग जल जाती है , फूँक कर दम फुलाने की कोई जरूरत नही । समझदार बेटी की बात सुनकर माँ का चेहरा “दर्प”से दमक गया ,लेकिन थोड़ी देर मे ही ,”चमकता” हुआ चेहरा बुझ गया ।

सात लोंगो के लिए रोज चूल्हे पर रोटी बनाना आसान काम न था तेतरी की माँ के लिए ।
घर का पुरूष वर्ग दिहाड़ी पर काम करने के बाद अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा या तो जुआ खेलने मे उड़ा देता या ताड़ी या शराब के ठेके पर ।

“जवान जट्ठे “लड़के भी एक न सुनते अपने बाप के नक्शे कदम पर ही चल रहे थे। गांव के कोने कोने मे बैठकर जुआ खेलना ,पैसे की उगाही के लिए लड़ाई दंगा करना यही काम रह गया था तीनो लड़कों का ।कहने को तो बेटों वाली कहलाती थी लेकिन बेटों के रहने से भी चैन और आराम कहाँ था।

यही सब सोचते सोचते सरपंच जी के दरवाजे पर ठिठक गई ।पंचायत मे आने के कारण जंगल से लकड़ी लाने का काम भी न कर पायी थी वो ,थोड़े से उपले उन्हीं केअहाते से ले कर घर की तरफ चल पड़ी ।

सबसे बड़ी चिंता गलत सोहबत मे पड़े लड़कों के कारण हो रही थी। इकलौते बक्से की चाभी गले मे काले धागे मे दुर्गा जी के लाकेट के बगल मे ही लटकाई रहती है, फिर भी पता नही कैसे बक्से मे मुसीबत के समय के लिए गुदड़ी मे छिपा कर रखे हुए 100,200रुपया पर भी हाथ साफ कर लेते थे।

आजकल तो सबसे बड़ी तिजोरी अपने शरीर को ही बना लिया है ,सोचते सोचते अपनी साड़ी के आँचल को घबरा कर के टटोला ।पल्लू मे बाँधकर रखती है आजकल अपनी जमापूँजी और सरपंच जी के यहाँ पोता होने पर मिले रुपये और चाँदी के सिक्के को ,अपने खजाने को सुरक्षित देखकर एक बार फिर से उसका चेहरा खिल गया।

अपनी बेटियों के साथ घर की तरफ बढ़ चली ।आज तीनों बड़ी खुश थी ,अपनी जमापूँजी से गैस चूल्हा और सिलेंडर ले आयेंगे।अब क्यूँ जायेंगे हम जंगल मे लकड़ी इकट्ठा करने कितना थकाने वाला काम होता है। कभी अधगीली लकड़ी मिलती है तो कभी सूखी ।

ऊपर से जंगल की तरफ जाने का रास्ता कितना सूनसान होता है। ऊँची ऊँची मेड़ों पर से खेतों को पार करना होता है ।शाम का धुन्धलका छाते ही मेड़ों के नीचे जंगली जानवरों के छिपे होने का खतरे के अलावा “इंसानी भेड़िये”भी तो छुप कर बैठे रहते हैं,इसीलिए तो देर होने पर चलती हुई सड़क का लंबा रास्ता लेकर आना पड़ता है।वैसे भी आजकल का जमाना बड़ा खराब है। जंगल से वापस आते समय झुण्ड से अलग होते ही हादसा होने का खतरा अलग होता है।

इसी सोच विचार के साथ उपले लगा कर चूल्हा सुलगा लिया, छोटी बेटी के चेहरे पर भूख के साथ-साथ थकान दिख रही थी ।सुबह ज्यादा पानी डालकर चावल पकाया था माँड़ अलग कर के रख गयी थी पतीले मे ,जल्दी से उसमे चुटकी से नमक डालकर दोनो बेटियों को एक एक गिलास भरकर देकर, पेंदी मे बचा हुआ खुद लेकर बैठ गई पेट के अंदर उछलकूद मचाती हुई आँतो को जरा सी शांति मिली ।

आज तो सुबह से बरसात भी नही बंद हो रही ,खपरैल घर टपक अलग से रहा है।तभी अचानक से जोर से खाँसी का दौर आया ,ऐसा लगा आज तो “प्राण पखेरु” उड़ ही जायेंगे। ये सब चूल्हे के धुंए की ही कारस्तानी है ,ऐसा लगता है सारे शरीर मे धुंआ ही भरा है ,फेफड़े अलग कमजोर हो गए हैं ।बरसात के टपकते हुए पानी ने सारे घर को और सामान को गीला कर दिया था ।एक कोना सूखा नजर आ रहा था,उसी कोने की तरफ का रुख कर लिया उसने ।

भीगा भीगा सारा घर भीगे हुए उपले छोटी सी दो कमरे की झोपड़ी मे धुआँ ही धुआँ भर गया।
अब चिंता इस बात की थी कि रोटी कैसे बनेगी थोड़ी देर तक इंतजार किया उसने चूल्हे की आग शायद धधके तो खाना बनाऊँ ।

एक बार फिर से अपने पल्लू को टटोला खजाना सुरक्षित है कि नहीं , नोट हल्के से सिमसिमे हो गए थे तब होश आया खुद भी तो पानी मे भीग गई थी ।पल्लू से आहिस्ता से रुपये निकाल कर पत्थर से दबा कर चूल्हे से थोड़ी दूर पर कड़क होने के लिए रख दिया ।

थोड़ी देर मे ही जोर-जोर से दरवाजा पीटने की आवाज सुनाई पड़ी ।उसका शराबी पति और लड़के आ गए थे इतनी जोर-जोर से दरवाज़ा पीटना तो झोपड़ी का कमजोर दरवाजा न सहन कर पायेगा । फुर्ती से उठी सबसे पहले अपने रुपयो को पल्लू मे जोर से गठान लगा कर बाँध कर कमर मे खोस कर बढ़ चली, आने वाले तूफान का सामना करने के लिए ।

पति के साथ-साथ लड़कों ने भी नशा किया हुआ था । सिर पकड़ कर बैठ गई ,रोटी का ठिकाना नही शौक रईसों के पाल लिये निठल्लों ने ।तभी अचानक से पति की जोर से गुर्राने की आवाज सुनाई पड़ी पंच सरपंच की बातों पर भरोसा करने की कोई जरूरत नही आग जलाने के लिए कोई पैसा फूँकता है क्या?

पूरा जंगल लकड़ियों से भरा पड़ा ,चरते हुए जानवर पूरे गांव मे तमाम मिलेंगे,उपला बना कर रख ले ,खबरदारररर !अगर गैस चूल्हा और सिलेंडर लेने के लिए पैसा फूँका तो ।जब तक घर से धुँआ न निकले तब तक कैसे लोगों को पता चलेगा कि हमारे घर मे दोनो जून का खाना बनता है ।

तेतरी की माँ ने अपनी बेटियों के मुँह की तरफ देखा दोनो भूखे पेट ही गहरी नींद मे सो गई थी।उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गई ,आने लगी अब इन दोनो को भी भूखे पेट नीद अपने आप से ही बोला उसने।
अपने कमर मे बँधे हुए रुपयों को टटोला मन मे कुछ निर्णय लिया बढ़ चली चूल्हे की तरफ रोटी बनाने के लिए ……

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( समस्त चित्र internet के द्वारा )

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2 thoughts on “PODCAST-चूल्हे की रोटी 

  1. बड़ा अच्छा विषय चुना है आपने और अपने लेख के साथ पूरा न्याय किया है. बहुत अच्छा लेख.

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  2. ज़रा सा असमंजस के साथ और गरीबों कोध ध्यान से देखने के बाद इस विषय पर लिखने का ख्याल आया ।
    उत्साह बढ़ाने के लिए धन्यवाद 😊

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