गौरैया की उधेड़बुन 

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Spread Positivity

            “तलाश” कर रहे हैं अपना “ठिकाना ”  

        “तिनकों ” को खोज कर ” घोंसला ” है बनाना
               घरों से ” आँगन ” तो अब खो गये
    बहुमंजिली इमारतों मे ” आँगन ” के नाम बदल कर
                 अब ” बालकनी ” हो गये

        झाड़ियाँ ,पेड़ और बेलें तो नाममात्र के ही मिले।
       जिधर नजर फेरो उधर “कंक्रीट” के जंगल हैं खड़े ।

   आजकल कानों मे गूँजती धीमी धीमी सी “तरंग” है ।
       डालती हमेशा हम पक्षियों को ये “भ्रम” मे  है।

        समझ मे आ गया अब इन तरंगों का “उद्गम”।
      इन “मोबाइल टावरों”ने ही किया है हम गौरैयों
                   के जीवन को “दुर्गम”।

   इन्ही तरंगों ने रोक दिया है, हम पक्षियों के “हृदय” का “स्पंदन” ।

         “दाना दुनका” भी दिखता है “नाममात्र”का
          किसी को भी ख्याल नही है हम गौरैयों के
                            “जज्बात” का।

Spread Positivity    झूलने को बेल नही मिली तो इन्हीं तारों का” सहारा” है।
             हमने तो अपना झूला इन्हीं तारों को बनाया है।

       प्रकृति का “प्रभाविता का नियम” हमारे ऊपर
              ही “सार्थक” होता जा रहा है।

     बिखरे हुए “दाने दुनके” को कबूतरों का “झुण्ड”
                  खाया जा रहा है।

   इस तार के ऊपर “बंधु बाँधवों” के संग बैठे हैं।
    अब ये मत सोचना कि “निठल्ले”ही बैठे हैं।

        काम बड़ा महत्वपूर्ण कर रहे हैं।
    ऊँचाई पर बैठ कर अपना “आशियाना ”
        कहाँ बनाये वो जगह खोज रहे हैं।

       एक समय था जब हमारी “चहचहाहट”
                बहुत “मायने “रखती थी ।
          हर घर के आँगन मे अपने “ठिकाने ”
                      रखती थी।

       बदलते हुए समय की “भागादौड़ी” ने
                 लोगों को उलझा दिया।
            सिर्फ “भौतिकता” के पीछे भागना
                         सिखा दिया।

          अपने बच्चों की “खिलखिलाहट”को देखना
                    भी भूल गया इंसान ।
           सोच लो अब हमारा क्या रह गया है
                 इंसानों के जीवन मे स्थान।

               आज बैठे हैं इसी उद्देश्य से यहाँ।
             उम्मीद की किरण दिल मे जगा कर।
       इंसान को प्रकृति की “अहमियत” सिखाकर।
 
      एक बार फिर से इंसानों के पास अपनी जगह खोजते हैं।
आँगन न सही बालकनी और छज्जों मे ही अपने घोंसले बुनते हैं।

      चलिये एक बार फिर  से हम गौरैयों की “चहचहाहट” के साथ
                     “पर्यावरण “के बारे मे सोचते हैं ।

चित्रhttp:// http://www.clicksbysiba.wordpress. com के सौजन्य से 

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