यात्रा विचारों की भी (A Journey of thoughts)

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ए “श्री”, तू फिर से चिपक कर बैठ गयी ट्रेन की खिड़की से , तेरे से ज्यादा बोर लड़की हमने आज तक नही देखा ,सहेलियों ने बड़ी जोर से डांटा था “श्री” को लेकिन “उसके कान पर जूँ तक नही रेंगी”(सहेलियों की कही बातों का उसके ऊपर कोई असर नही हुआ)।

 
बड़े आराम से उसने जवाब दिया ,अब तुम लोग मेरी बात को ध्यान से सुन लो । तुम लोगों को पूरी ट्रेन मे तफरी करनी है तो जाओ कर लो , जिस जिस बोगी मे लड़कों को खोजना है खोज लो लेकिन भगवान के लिये हमे छोड़ दो, हम नही आने वाले तुम लोगों के साथ ।

अब भागो मेरे सिर के ऊपर से जब तक तुमलोग , हम सारी सहेलियों की किसी एक बोगी मे इकट्ठे होने की जगह खोजो तब तक मै उजाले मे बाहर के नजारे देखती हूँ । अभी अँधेरा होने मे 4-5 घंटे का समय है , इतना बोल कर वो फिर से ट्रेन की खिड़की से चिपक ली।

सारी सहेलियाँ गुस्से मे अपना पाँव पटकते हुये दूसरी बोगी मे चली गयी । ‘युवा महोत्सव’ से युनिवर्सिटी के बच्चे वापस आ रहे थे ।पूरी ट्रेन मे अलग अलग शहर के बच्चे भरे हुये थे ।इस बार जोनल नार्थ ईस्ट मे था इसलिये सफर भी खूबसूरत था , हरियाली के बीच मे ट्रेन का सफर बड़ा प्यारा होता है “श्री” मन ही मन मे सोच रही थी ।

Spread Positivity लेकिन वापस लौटते समय किसी मे भी वो उत्साह नही दिख रहा था , जो जाते समय था । वैसे भी पता नही ये पक्षपात कब खत्म होगा कई बार तो समझ मे भी नही आया कि, हमारी युनिवर्सिटी के बच्चे हारे क्यों ?साथ मे गयी हुयी टीचर्स भी आराम से किसी कोने मे बैठ कर अपनी शापिंग के बारे मे बातें करने मे लगी हुयी थी।

ये लड़कियाँ भी मेरा दिमाग चाट गयी , देखते-देखते कितने सारे नदी नाले तालाब निकल गये गिन भी नही पायी “श्री”मन ही मन मे बुदबुदा रही थी । अचानक से उसकी आँखों की चमक बढ़ गयी ।

Spread Positivity कई पेड़ तो ऐसे लग रहे थे कि मानो अपनी शाखाओं को नदी के पानी मे डुबकी लगवा रहे हों तेज हवा के झोंकों के साथ झुकी हुयी शाखायें पानी मे डुबकी मार कर बाहर आ रही थीं।उनकी पत्तियों मे से पानी की बूँदे बड़ी तेजी से अलग होकर हवा मे बिखरती जा रही थीं । ट्रेन की खिड़की से देख कर उन पानी की बूँदों की शीतलता को महसूस कर पा रही थी “श्री”।

सारी ट्रेन मे ‘चिल्ल पों’ मची हुयी थी । कोई अपनी बर्थ पर अधलेटा हुआ प्लेटफार्म पर मिलने वाला कोई साहित्य पढ़ रहा था , कोई चने वाले से चने बनवाते समय उसमे मिर्च और प्याज की मात्रा जाँच रहा था । प्लेटफार्म पर मिलने वाली पूरी और सब्जी कितनी स्वादिष्ट दिखती है न ।पता नही स्वाद कैसा होगा खरीदूँ कि न खरीदूँ सोच मे पड़ गयी “श्री” क्योंकी पिछले साल प्लेटफार्म पर खरीद कर खाये हुये समोसे के दुष्परिणाम याद आ गये उसको ।

अब पूरी सब्जी वाले स्टाल पर उसकी नजर गड़ गयी हाय ! कितना ‘कंजूस’आदमी है गोल गप्पे से ,थोड़ी सी बड़ी पूरी ही तो बना रहा था वो , कितनी सावधानी से लोई काट रहा था कि कहीं कोई पूरी बड़ी न बन जाये ।

इस आदमी को तो किसी दिन जोर से भूख लगी हो और इसकी बीबी इसको इतनी बड़ी बड़ी ही केवल चार पूरी दे , तब इसे समझ आयेगा कि भूख के समय पूरी और रोटी की साइज कितनी महत्वपूर्ण होती है । पूरी सब्जी वाले के ऊपर बहुत जोर से गुस्सा आ रहा था उसे । वैसे भी कितनी मरी मरी पूरी बना रहा है ,कढ़ाई मे खिल ही नही रही है । मेरी बनायी हुयी पूरी तो कढ़ाई मे पहुँचते ही अपने गालों को फुला कर नाचने लगती है मन ही मन मे सोच रही थी वो ।

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माँ ने कितनी सारी खाने की चीजें जाते समय रास्ते के लिये दी थीं और बड़े प्यार से समझाया भी था ,सबकुछ दोस्तों के बीच मे बाँट मत देना , मै तुम्हारी इस आदत से बड़ी परेशान हूँ , खुद का पेट भरे या न भरे , तुम्हारा सारा खाना दोस्ती निभाने मे ही चला जाता है । कम से कम अपने पेट का तो ध्यान रखा करो,चलो अपने पेट का न सही तो अपनी माँ की मेहनत की कद्र करना तो सीख लो ।तुम्हारी ममता ही है, जो मुझे रसोईघर मे खड़ा रहने पर मजबूर करती है ।

माँ की समझायी हुयी सारी बातों के साथ-साथ उनके बनाये हुये लड्डू और नमक पारे का स्वाद भी जीभ पर आ रहा था। “श्री” के चेहरे पर आते जाते हुये भावों को शायद सामने बैठे हुये लोग पढ़ने की कोशिश कर रहे थे ।

सामने बैठे हुये एक बुजुर्ग व्यक्ति ने उसके दिमाग की उथल पुथल को पढ़ लिया और बड़े प्यार से पूछा बेटा भूख लगी है शायद तुम्हें !आओ यहाँ आकर हमारे साथ खाना खा लो । ये ट्रेन भी बड़ी अजीब सी जगह होती है ,किसी का भी खाने का डिब्बा खुलते ही अगल बगल बैठे लोगों की नजर एक बार तो जरूर उधर जाती है ।

अगर साथ मे छोटे बच्चों वाला परिवार होता है तब तो बड़ी मुश्किल होती है बच्चों को सँभालने मे , वो तो दूसरों के खाने को बार बार  घूरते हैं , भले उनका पेट भरा हो और खाने की ढेर सारी चीजें उनके पास हो माँ के लिये थोड़ी शर्मनाक स्थिति होती है । बड़ों को भी अपने आप को दूसरी तरफ व्यस्त करना पड़ता है ,मन ही मन मे वो सोच रही थी ।

अरे नहीं अंकल !पेट तो हमारा भरा हुआ है, लेकिन प्लेटफार्म पर मिलने वाली पूरी सब्जी लालच दिला रही है और कोई बात नही है । चलो कोई बात नही , अच्छा आओ कम से कम हमारे साथ यहाँ आ कर बैठ तो जाओ , अकेले बैठे बैठे बड़ी देर से कुछ सोच रही हो उन अंकल ने अपनत्व दिखाते हुये “श्री “के साथ बातों का सिलसिला  आगे बढ़ाने की कोशिश किया ।

नहीं अंकल आप  गलत सोच रहे हैं , मेरी तो बचपन से आदत है । ट्रेन या बस की खिड़की मिल जाये तो मै 5या6 घंटे भी बाहर देखते हुये निकाल सकती हूँ , और खुश रहती हूँ, ऐसा लगता है कि रास्ते मे मिलने वाले पेड़, नदी , तालाब सब अपनी अपनी गर्दन हिला-हिलाकर मुझसे बातें कर रहे हों , अच्छा लगता है मुझे , ऐसे शांत होकर बैठना।

बड़ी मुश्किल से उन बुजुर्ग अंकल को टाल पायी थी ” श्री “। उन अंकल के बगल मे बैठा लड़का शायद उनका पोता रहा होगा, उसके चेहरे की सारी चमक अचानक से गायब हो गयी कितने चक्कर काट चुका था वो पूरी ट्रेन के ।

लगता है

गर्लस कालेज के चक्कर काटने की आदत पड़ी हुयी थी बेचारे को ।

बीच-बीच मे ट्रेन के गेट पर खड़ा होकर अपने मुँह मे लगी हुयी सिगरेट वाली भट्टी भी लाइटर से सुलगा रहा था और  वापस आते समय कपड़ों पर डिओ छिड़क कर और च्विन्गम चबाते हुये बनावटी मुस्कान चिपका कर वापस बैठ जा रहा था ।शायद उसकी बहन थी वो जो उसके बगल मे बैठते ही रहस्यमयी हँसी हँसकर लम्बी लम्बी साँसे चुगली वाले अंदाज मे खींच रही थी ।

लेकिन कितना ‘बत्तमीज’ लड़का था वो बार बार ‘कनखियों ‘से घूरे पड़ा था । हास्टल मे रहने के कारण और अकेले सफर करते-करते ऐसे लोगों की नजरों को पहचानने की आदत पड़ गयी थी उसको ।

सारी सहेलियाँ जुगत लगाने मे जुटी हुयी थी कि सब एक साथ इकट्ठे कैसे हो कोई एक बोगी मे
था तो कोई दूसरी बोगी मे ।सारा काम बड़ी तल्लीनता के साथ हो रहा था सबने अपने सामान को चेन से बाँधकर रखा हुआ था ।

तभी बड़ी जोर से आवाज आयी “श्री” यार आ चल ,बगल वाली बोगी मे हम सभी को बर्थ मिल गयी ,बड़ी मुश्किल से मनाया यार उन लड़कों को एक दो घंटे की बातचीत मे ही मान गये ।चल न ,अब देर मत कर ,ला तेरा सामान हम सब मिलकर ले चलते हैं, वैसे भी तेरा काम बिना कुली के तो चलता नही।

पागल लड़की 3-4 घंटे से बैठी हुयी है अकेले ,ये नहीं कि थोड़ा सा ट्रेन मे तफरी ही कर लेती ,तेरे जैसे लोगों का तो भगवान ही मालिक है ।अपनी सहेलियों की प्यार भरी डांट सुनकर हँसते हुये बर्थ छोड़ कर खड़ी हो गयी “श्री”। तभी अचानक से नमिता चिल्लायी यार आँटी के कारण ही तेरा इतना सामान बढ़ता है।

कितनी सारी खाने पीने की चीजें बना कर देती हैं हम सब के लिये ,लेकिन “श्री” इस बार तो हास्टल पहुँचने के पहले ही सब कुछ खत्म हो गया । सारी की सारी भुक्खड़ सहेलियाँ दुखी हो गयी ।अंकल का पोता बेचारा दुखी और बेचैन हो गया ,तभी अचानक से  “श्री” को बड़ी जोर का धक्का लगा पीछे मुड़कर देखा तो हमउम्र एक लड़की थी ।

आप यहाँ से जा रही हैं क्या? मेरा सफर सिर्फ 4घंटे का है सोने के समय के पहले मै उतर जाऊँगी मै बैठ जाऊँ क्या यहाँ ? उस लड़की ने पूछा ,”श्री” के कुछ बोलने से पहले अंकल का पोता “दाल भात मे मूसर चंद “(दो लोगों की बातों मे जबरजस्ती घुसना) जैसे कूद  पड़ा और फोन को चार्जिंग प्वाइंट पर लगाने के बहाने पास मे आ कर खड़ा हो गया।

आप बैठिये आराम से अगर कोई आयेगा भी तो , आप हमारी बर्थ पर आ जाइयेगा , मै तो इधर उधर टहल कर टाइम पास कर लूँगा, उसके चेहरे की चमक वापस आ गयी थी ,बड़ा खुश दिख रहा था ।

धीमी सी आवाज मे “श्री” के पास आकर उसने बोला बाय !सारी सहेलियों ने एक साथ बोला हाय !फिर जल्दी से बोला बाय !सभी मुस्कुराते हुये पड़ोस वाली बोगी मे चली गयीं और एक बोगी मे समा गयी ।

सारी रात अन्ताक्षरी का धमाल होने वाला था । तीन दिन के युवा महोत्सव मे किसके पास क्या मसाला था , उसका पोस्टमार्टम होना बहुत जरूरी था। खिड़की के बाहर अँधेरा छाने लगा था लेकिन ट्रेन के अंदर की रौनक बढ़ गयी थी ।थोड़ी देर पहले तक दिखाई देने वाली पाँच खुराफाती लड़कियाँ कहीं गायब हो गयी थी । ट्रेन खड़ी थी कोई स्टेशन था शायद ।

अचानक से जोर जोर से आवाज आने लगी ,’एक्सक्यूस मी प्लीज’ रास्ता दीजिये नही तो ये सारा खाना आपके ऊपर ही गिर जायेगा ,देखा तो खुराफाती टीम हाथ मे खाना लेकर आ गयी थी । उनके हाथों मे प्लेटफार्म पर मिलने वाले समोसे ,पूरी-सब्जी और दो या तीन थर्मस मे काॅफी थी ।

सभी की आँखों की चमक बढ़ गयी, किसी को भी हाइजीन का कोई ख्याल नही था सब टूट पड़े भुक्खड़ों जैसे खाने पर क्योंकी “सफर अभी लंबा था और सभी के पेट मे भूख ने मचाया हल्ला था”ट्रेन ने बड़ी जोर से सीटी मारी और चल पड़ी  अपने गंतव्य पर।
बोगी मे होने वाला शोर ममधुमक्खियों की भनभनाहट से शुरू होकर मैनाओं के शोर मे बदल गया था ……

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  (समस्त चित्र internet के सौजन्य से ) 

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