Story of Life : Diwali,the Festival of Light

हमारे देश की तो बात ही निराली है……कितनी विविधता है हमारे यहाँ…. मौसम के बदलते ही थोड़ा सा परिवर्तन हमारे अंदर भी होता है और तुरंत ही उत्साह बढ़ाने के लिए कोई न कोई त्योहार आ जाता है ….मुझे नहीं लगता कि कोई भी मौसम ऐसा होगा जिसमे कोई न कोई festival नआते हो…..

हमने देवी माँ की आराधना भी कर ली… रावण दहन भी कर लिया… करवा चौथ भी मना लिया ….अब तो दीपावली भी आ गयी सारे त्योहार दबे पांव चुपके-चुपके से आते है और हमारे अंदर positivity भर कर चले जाते हैं

सितंबर से दिसंबर तक के मौसम की तो बात ही निराली है चारो तरफ उत्साह ही उत्साह रहता है ..मुझे तो सबसे ज्यादा पसंद दीपावली और होली है ..होली इसलिये क्योंकि बहुत सारे रंग होते हैं खुद को रंगने के लिये और रंग मुझे बहुत ज्यादा पसंद है….

दीपावली के दिये की रोशनी से सब कुछ कितना उजला -उजला सा हो जाता है…. लेकिन दीपक के पास घूमते हुये पतंगो को देखा है आपने ….एक नंबर के बुद्धू दिखते हैं चकाचौंध के पीछे भागते हुये बंद आँखो से सबकुछ छोड़ कर बनावटी ,दिखावटी ,लालच से भरे हुये इस बात से अनजान की थोड़ा सा तो जीवन है शांत मन से बिना किसी उद्वेग के जी ले…

लेकिन उसी चकाचौंध के पीछे भागते हुये अपने जीवन को निरर्थक कर देते हैं ..सच मानिये तो दीपावली के दिये की रोशनी को देखकर ऐसा लगता है कि हर किसी की आत्मा की अमावस्या की कालिमा को दिये की रोशनी ने उजला कर दिया है …

और एक बार फिर से दीपावली के उत्साह ने मुझे कविता लिखने के लिये प्रेरित कर दिया…..

दीप दीवाली आती है, मन मे दिये जलाती है…

मत जीना कीट पतंगो जैसा …
निर उद्देश्य निरर्थक जीवन कैसा ….
सीख हमे सिखाती है…

उम्मीदों और आशाओं के प्यारे कुसुम खिलाती है..
हम सब के जीवन मे उजियारा भी लाती है ..

अमावस्या की अँधियारी को दीपक द्वारा भगाती है …
जीवन के अँधियारे को भी तो मन की ज्योति भगाती है ..

प्रकाश फैलाती ये रंगबिरंगी लड़ियाँ…
जीवन के इंद्रधनुष को ही तो दर्शाती है…

हर मन हो रंगबिरंगा इंद्रधनुष सा जीवन सबका…
हम सब को बतलाती है…

सबके मन मे आस्था और विश्वास की ज्योति जलाती है…
दीप दीवाली आती है मन मे दिये जलाती है…

शारीरिक रूप से थकाने वाले त्योहार होते हैं लेकिन मानसिक रूप से स्वस्थ कर जाते हैं किसी भी त्योहार का उत्साह आप के अंदर कितना है, ये आपके बचपन पर निर्भर करता है ,कि आपने बचपन मे किस तरह से त्योहारों को उत्साह के साथ मनाया है…

मेरी तो बड़ी मीठी मीठी सी यादें हैं दीपावली की हम तो 15-20 दिन पहले से ही तैयारी करना शुरू कर दिया करते थे …हम छोटे बच्चे मिलकर प्यारा सा एक घरौंदा बनाया करते थे अपनी कल्पना के हिसाब से …

घर के बगीचे से इकट्ठी की गयी मिट्टी लकड़ी के टुकड़े ईंट और गत्तों के टुकड़े से निर्माण किया जाता था। क्या कोई architect designing करते होंगे जो हम design बनाया करते थे ,बहुत मेहनत लगती थी 10-15दिन की पढ़ाई चौपट हुआ करती थी ।सारे कपड़े मिट्टी मे सने होते थे ,लेकिन इतनी मेहनत के बाद सुन्दर सा घरौंदा बनता था ….

सबसे ज्यादा मुश्किल आती थी ,सीढ़ीयाँ बनाने मे शाम को सीढ़ीयाँ बनायी जाती थी ,और सुबह गिरी हुई मिलती थी ,ठीक वैसे ही जैसे बड़े होने पर आप अपने जीवन को भी सीढ़ी जैसा पाते हैं। आपके भविष्य की सीढ़ीयाँ बनती हैं ,और गिर जाती हैं, फिर से बनाते हो फिर गिर जाती हैं। बार बार के अथक प्रयास के बाद आप अपने जीवन मे कुछ अच्छा कर पाते हो और यही से Positivity की शुरुआत होती है …..अपने आप को मजबूती के साथ किसी ऊँचाई पर पहुँचा पाते हैं। घरौंदे के सामने बगीचे को सजाने और घरौंदे को पेन्ट करने के बाद निर्माण पूरा होता था …अगर आप को अपने गमले मे या घर के सामने हरियाली लानी है, तो मेथी के दानो को हल्की गीली मिट्टी मे बिखेर दीजिए 2से3दिन मे ही नन्हे-नन्हे कोमल पौधे तैयार हो जाते हैं ….उस हरियाली के बाद ही हमारा घरौदा तैयार होता था और हम सबके चेहरे पर मुस्कान आया करती थी …तभी हमारे अंदर Positive effect of nature आता था..

दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजन के बाद जैसे सारे घर मे दिया जलाया जाता था वैसे ही हमारा घरौंदा भी रोशन हुआ करता था ….बीच-बीच में हम आकर देख जाया करते थे अपने घरौंदे को सबसे ज्यादा बचाना पड़ता था, अपने घर के और आसपास के शैतान बच्चों से जो हमारे घरौंदे के अंदर ही लड़ी या बड़े वाले बम को जलाने के फिराक मे रहते थे…. बिल्कुल आतंकवादियो जैसे ..लेकिन कुछ दिन के बाद हमारा घरौंदा इसी तरह की आतंकवादी गतिविधि के तहत ढह जाया करता था। बड़ा दुख होता था बचपन मे जल्दी ही दुखी करने वाली चीजें दिमाग से उतर भी जाती है ….

आज भी जब दीपावली का त्योहार पास आता है तो बचपन का घरौंदा बड़ा याद आता है…. लेकिन अब हमारी भूमिका बदल चुकी है ….आजकल बच्चों का ज्यादातर समय मोबाइल और लैपटॉप मे ही गुजर जाता है… और रही सही कसर आसपास की भेड़चाल उन्हें सिखा देती है। बच्चों का सारा उत्साह वही खत्म हो जाता है ….

“अति सर्वत्र वर्जयेत” वाली बात बिल्कुल सही है। लेकिन थोड़ी आतिशबाजी कम pollution करने वाली तो हम चला ही सकते हैं… नहीं तो हम अपने बच्चों को वो सब नहीं सौंप पायेंगे… जो विरासत हमे सौपी गयी है चाहे वो लक्ष्मी पूजन की विधि हो या रोशनी का मजा ……

निश्चित तौर पर दीपावली हम सब मे उत्साह भर कर जाती है और जाते जाते हमारे कानों मे बड़े प्यार से बोलकर जाती है …..

Always be positive friends

(समस्त चित्र internet के सौजन्य से )

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