Destination-Positivity; My First Solo Train Travel

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प्रकृति जीवन की फिलासफी बताती है । जीवन मे आने वाले बदलाव को positive तरीक़े से हमे समझाती है । प्रकृति ही तो है ,जो उजड़ने  या Negativity के बाद सँवरना या Positivity सिखाती है ।

आपने देखा है , नर्सरी मे से नन्हे-नन्हे पौधों को थोड़ी सी मिट्टी के साथ निकालकर अलग जमीन या गमलों मे पनपते हुए?

आपने देखा है , गाँव मे धान के खेतो को जहाँ नन्हे-नन्हे कोमल पौधे पनपते है , झुंड मे फिर उनको रोप दिया जाता है अलग जमीन मे प्रकृति के हिसाब से बड़ा होने के लिये ।

” बाबुल ने मोहे रोपा था  ,धान समझकर
                                हम बन गये बरगद की , छाँव बढकर ”                             

ठीक वैसे ही लड़कियाँ होती है । जन्म अलग घर  मे लेती है , कोमलता के साथ बड़ी होती है , फिर अलग मिट्टी अलग परिवार मे रोपित होती है , हमारी सामाजिक परंपरानुसार ।

बात उस समय की है , जब मैने अपनी माँ का आँचल छोड़ कर , दूसरे आँगन मे अपने कदम रखे ।विवाह के दूसरे या तीसरे दिन से ही मुझे इस बात का बोध कराया गया , कि शादी के बाद भी तुम्हें अपनी पहचान बनाये रखनी है ।

सभी के कहने का मतलब यह था कि छोटी-छोटी चीजों के लिए , कहीं आने जाने के लिए अपने पति या परिवार के किसी अन्य सदस्य के ऊपर निर्भर होने की जरूरत नहीं है ।

मेरे लिए ये चीज बड़ी असामान्य सी थी । क्योंकि मै जिस परिवार मे पली-बढ़ी थी , वहाँ पर चाहे पापा हो या भाई हर समय बेटी या बहन की बातें सुनने के लिए तैयार रहते थे ।

कुछ दिनो के बाद ही  विदाई के लिए मेरे मम्मी-पापा मुझे लेने आये । अपने मम्मी-पापा के साथ अपने घर जाने का उत्साह मै शब्दो मे बयान नहीं कर सकती । कुछ दिन वहाँ बिताने के बाद , मै वापस आ गयी , और अपनी lab के  काम मे जुट गयी । बीच -बीच मे  मायके आने-जाने का क्रम चलता रहा ।

जल्दी ही मेरा फिर से अपने घर  जाने का समय आया । सुबह-सुबह मुझे मेरे आने जाने दोनो का टिकट मिल गया । सभी ने मुझे ये समझाया कि , तुम्हे अब अकेले सफर करना सीखना होगा।  आगे से रिजर्वेशन कराना भी खुद सीखो , क्योंकि महिलाओं को सारे काम आने चाहिए नहीं तो आगे चलकर तुम्हें खुद ही परेशानी होगी ।

मैने अकेले का सफर मुश्किल से 45-60km का किया हुआ था ,वो भी दिन का ।मुझे डर के मारे पूरी रात नींद नहीं आयी , आधा दिन और पूरी रात का सफर मै अकेले कैसे करूँगी ।

दूसरा दिन मेरे सफर का था ।

women in Saris

धड़कते दिल से मैंने ट्रेन की सेकण्ड क्लास स्लीपर कोच मे अपना पाँव रखा । साड़ी पहने होने के कारण लोवर बर्थ की प्राथमिकता थी ।

हमारे देश में बहुत बड़ा तबका उन लोंगो का है , जो दैनिक यात्री है । ये लोग रिजर्वेशन वाले डिब्बो को अपनी खुद की संपत्ति समझते हैं ।क्या आत्मविश्वास  होता है,उनके अंदर ।पूरी की पूरी मंडली होती है उनके साथ ।  रेल उनकी अपनी संपत्ति होती है।News paperया उनके पास उपलब्ध किसी भी सामान से पूरी की पूरी बर्थ आरक्षित कर लीजाती है ।

अगर आप उनसे  रिजर्वेशन होने का दावा करते हो, तो उनके चेहरे पर ढीठता वाली मुस्कान आती है । अरे ! आप भी बैठ जाओ न मैडम जी , कौन सा हम ये बर्थ अपने साथ अपने घर ले जाने वाले है , बस दो घंटे की तो बात है , और थोड़ी सी जगह आप को भी मिल जायेगी खुद की रिजर्व बर्थ पर बैठने के लिए ।

मेरा शादी के साल भर के अंदर ही अकेले मायके जाना मेरे रिश्तेदारों कीआँखों मे चुभने लगा सबको लगा कि लगता है कि आपस मे कुछ मनमुटाव हो गया लड़का-लड़की मे इसीलिए लड़की अकेले आ रही है । गनीमत है कि उस समय मोबाइल फोन का इतना ज्यादा प्रचलन नहीं था । नहीं तो पता नही कितने लोगो को अपनी स्थिति बतानी पड़ती।

मुझे मालूम था कि मेरी  ट्रेन में कभी कभी डाका पड़ता  है! फूलन देवी के इलाके से  गुजरती   थी  न !

 मै सारी रात जगी रही , सोचती रही हे ! भगवान मेरा सफर सुरक्षित  रखना । जिस ट्रेन मे मै सफर कर रही  थी ,  वो रात को भयावह हो जाती थी । क्योंकि अंदर लाइट या तो बहुत धीमी होती थी या , नहीं भी होती थी ।उससे निपटने के लिए आपके पास टार्च होनी चाहिए , फिर अटैन्डेन्ट को खोजने की जरूरत नहीं ।

ट्रेन का मेरे गंतव्य पर पहुँचने का समय भोर का था , मै सोच रही थी ,  पता नही मेरे मम्मी-पापा मुझे लेने समय पर पहुँचेंगे की नहीं ।साड़ी की सेटिंग भी खराब हो चुकी थी ,  मुझे सब के ऊपर बहुत गुस्सा आ रहा था । इतनी जल्दी क्या है , मुझे सारा काम सिखाने की ,सीख जाऊँगी न आराम से ।

ट्रेन प्लेटफार्म पर पहुँचने  वाली थी । मै अपना सामान निकाल कर गेट के पास पहुँच गयी ।अगर आप अकेली महिला सफर कर रही हैं , तो लोग आपकी सहायता करने के लिए फटाफट तैयार हो जाते हैं । लेकिन उनमे से कुछ तो सही होते हैं , लेकिन कुछ के मतलब ही अलग होते हैं ।

मैने देखा मेरे मम्मी-पापा काफी व्यग्रता से प्लेटफार्म पर सरकती हुयी ट्रेन को देख रहे हैं , ऐसा लग रहा था बड़ी देर से मेरा इन्तज़ार हो रहा था ।

मेरी मम्मी  मुझे देखते ही भावुक हो गयी । कितने सारे सवाल थे उनके पास , सारे सवालों के जवाब देना बहुत जरूरी था ।किसी का दिया कुछ खाया तो नहीं ट्रेन मे , किसी ने परेशान तो नहीं किया ।

ट्रेन मे अपना कोई सामान तो नहीं छोड़ आयी ,एक बार सब कुछ अच्छे से देख लो ।मै बड़े प्यार से अपनी मम्मी को देख रही थी । मन किया  कि बोलूँ अब बस भी करिये अब मै बड़ी  हो गयी हूँ  , लेकिन नहीं बोल पायी बस उनके चेहरे  पर  आते जाते भावो को देखती रही ।

आज बेटियो की माँ होने के बाद मै सोचती हूँ कि, उस रात मेरी मम्मी कितना परेशान रही होंगी । शादी के इतने सालों के बाद जब अपनी तुलना पहले से करती हूँ , तो अपने पति के लिये  गर्व महसूस होता है । धक्का देकर उन्होंने मुझे कितने सारे काम सिखाये ।

daily yatri

महानगरो मे एकल परिवार में रहने पर पत्नी को ,  घर और बाहर के सारे काम आने चाहिए । पता नही किस समय किस चीज की जरूरत पड़ जाए ।शायद मेरे पति  ने  मेरे स्वभाव की भावुकता और जल्दी ही लोंगो के ऊपर विश्वास करने के दुष्परिणाम को पहले ही समझ लिया था ।
सही कहते हैं, बड़े बुजुर्ग मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए कड़वी दवाई बहुत जरूरी होती है ।

आप का क्या विचार है?

समस्त चित्र इन्टरनेट से साभार 

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2 thoughts on “Destination-Positivity; My First Solo Train Travel

  1. समय और परिस्थिति सब कुछ सिखा देते हैं, और नारियों में तो कुछ अलग ही शक्ति दी है भगवान ने।मैं आभारी हूँ कि उसने मुझे स्त्री बनाया।

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    1. You are lucky that your family gave you an opportunity to realise your strength. The secret of accomplishments by women in our society are support and freedom given by their family that gives us courage to think beyond our limits.

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